प्रीपेड मृत्यु: Prepaid Death

आज की आधुनिक और भागदौड़ भरी जिंदगी में ‘सफलता’ की परिभाषा बदल चुकी है। आज सफल उसे माना जाता है जिसके पास बड़ा बैंक बैलेंस हो, विदेश की नौकरी हो, और हाथों में महंगा गैजेट हो। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि इस अंधी दौड़ में हम क्या खो रहे हैं?

हाल ही में सोशल मीडिया पर झकझोर देने वाली एक कहानी सामने आई है—”प्रीपेड मृत्यु”। यह कहानी केवल एक भावुक प्रसंग नहीं है, बल्कि आज के कॉर्पोरेट युग और बिखरते मानवीय रिश्तों का एक ऐसा कड़वा आईना है, जिसे देखकर हर किसी की आँखें नम हो जाती हैं। आइए इस पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि यह हमारे समाज के बारे में क्या बयां करती है।

प्रीपेड मृत्यु

प्रीपेड मृत्यु (Prepaid Death): क्या सफलता की अंधी दौड़ में हम अपनों को पीछे छोड़ रहे हैं?:-

मुंबई  के एक बड़े और प्रतिष्ठित श्मशान घाट में दोपहर के ठीक 2 बजे थे। जून की तपती धूप और चारों तरफ सन्नाटा। तभी वहां कमल पहुँचा। कमल कोई आम इंसान नहीं था, वह अमेरिका की एक बहुत बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में ‘वाइस प्रेसिडेंट’ के पद पर कार्यरत था। वह अभी-अभी फ्लाइट से उतरा था और बिना घर गए, सीधे श्मशान घाट पहुँचा था।

उसके पिता, ‘किशोर’ (उम्र 73 वर्ष), का कल रात लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। कमल के एक हाथ में उसका महंगा लैपटॉप बैग था और आँखों पर ब्रांडेड रेबैन का चश्मा। उमस और पसीने के बीच वह बार-बार अपनी महंगी घड़ी देख रहा था। उसके चेहरे पर दुख से ज्यादा ‘जल्दी में होने’ के भाव थे।

वहाँ पहले से ही ‘मोक्ष इवेंट मैनेजमेंट’(एक ऐसी एजेंसी जो पैसे लेकर अंतिम संस्कार का पूरा प्रबंध करती है) का कर्मचारी ‘कमलेश’ खड़ा था। कमलेश ने पेशेवर तरीके से सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। लकड़ियाँ करीने से सजी थीं, पंडित जी मंत्रोच्चार के लिए तैयार थे, और किशोर के पार्थिव शरीर को स्नान कराकर अंतिम विदाई के लिए तैयार रखा गया था।

“मेरे पास सिर्फ 3 घंटे हैं…”

कमल चिता के पास आया। उसने अपने पिता के बेजान चेहरे की ओर एक सरसरी नज़र डाली। दुनिया के कायदे के मुताबिक, उसकी आँखों से एक-दो आँसू टपक गए। लेकिन तुरंत ही उसने अपनी घड़ी देखी और कमलेश को पास बुलाकर कहा:

“मिस्टर कमलेश, सब तैयार है ना? मुझे शाम के 5 बजे की रिटर्न फ्लाइट पकड़नी है। कल अमेरिका में मेरी एक बहुत ही जरूरी और क्रिटिकल मीटिंग है। प्लीज़, जो भी विधि है, उसे जल्दी खत्म कराइए।”

कमलेश यह सुनकर सन्न रह गया। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। जिस पिता ने इस बेटे की उँगली पकड़कर उसे चलना सिखाया, उसे पढ़ा-लिखाकर अमेरिका भेजा, उस पिता की चिता के पास रुकने के लिए इस ‘सफल’ बेटे के पास तीन घंटे का समय भी नहीं था? कमलेश ने मन मसोसकर शांत भाव से सिर हिला दिया।

विधि पूरी हुई। कमल ने भारी मन से या शायद एक औपचारिकता के तहत अपने पिता को मुखाग्नि दी। धुएँ के गुबार आसमान की तरफ उठने लगे।

जब चेकबुक से भारी एक पुरानी चिट्ठी हो गई:-

मुखाग्नि देने के तुरंत बाद, कमल चिता की आग ठंडी होने का इंतज़ार भी नहीं कर सका। उसने कमलेश को एक तरफ ले जाकर अपने कोट की जेब से चेकबुक निकाली और पेन हाथ में लेते हुए कहा:

“कमलेश, थैंक यू सो मच। आपने बहुत अच्छी व्यवस्था की। आपका बिल कितना हुआ? 50 हजार या 1 लाख? जो भी राशि है बताइए, मैं अभी चेक साइन करके दे देता हूँ। दरअसल, मैं अस्थि विसर्जन के लिए दोबारा भारत नहीं आ पाऊँगा, इसलिए वह काम भी आप ही अपनी एजेंसी की तरफ से करवा दीजिएगा।”

कमलेश ने कमल की ओर देखा। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब-सी करुणा और मुस्कान थी। उसने कमल के बढ़ाए चेक को हाथ नहीं लगाया। इसके बजाय, उसने अपने बैग से एक पुरानी, थोड़ी मुड़ चुकी फाइल निकाली और कमल के हाथ में थमा दी।

कमलेश बोला: “साहब, आपको बिल देने की कोई जरूरत नहीं है। आपका बिल पहले से ही ‘पेड’ (Paid) है।”

कमल चौंक गया। उसने अचरज से पूछा, “पेड? किसने भरा पैसा? क्या मेरे यहाँ रहने वाले चाचा जी ने भुगतान किया है?”

कमलेश ने गहरी सांस ली और कहा:

“नहीं साहब। आज से ठीक पाँच साल पहले किशोर जी (आपके पिता) हमारे ऑफिस आए थे। वे बहुत बीमार थे और ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे। उन्होंने मुझसे आकर पूछा था— ‘बेटा, तुम्हारा अंतिम संस्कार का पैकेज क्या है? मैं एडवांस देना चाहता हूँ ताकि कल को मेरे बेटे को कोई तकलीफ न हो, तुम सब इंतज़ाम कर दोगे ना?'”

“हमने उन्हें पैकेज बताया। उन्होंने उसी दिन 50,000 रुपये एडवांस जमा कर दिए थे। और जाते-जाते यह ‘चिट्ठी’ मुझे देकर कहा था कि जब मेरा बेटा आए तो उसे यह दे देना। और हाँ, उन्होंने यह भी कहा था कि अगर काम की वजह से वह न आ सके, तो तुम ही बेटे का फर्ज निभाकर मेरा अंतिम संस्कार कर देना।”

पिता का आखिरी पत्र: जिसने अहंकार को राख कर दिया:-

कमल के हाथ काँपने लगे। उसने जैसे ही वह चिट्ठी खोली, उसमें उसके पिता के काँपते हुए अक्षरों में लिखा था:

“प्रिय कमल (बेटा),
मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो। अमेरिका की उस बड़ी कंपनी में तुम्हें शायद चैन से साँस लेने की भी फुर्सत नहीं होती। मुझे यह भी मालूम है कि जब तुम्हें मेरी मृत्यु की खबर मिलेगी, तो तुम्हारे मन में सबसे पहले क्या आएगा— ‘ऑफिस से छुट्टी मिलेगी या नहीं? फ्लाइट की टिकट मिलेगी या नहीं? कल की ज़रूरी मीटिंग का क्या होगा?’

बेटा, तुम्हारा समय और तुम्हारा करियर बहुत महत्वपूर्ण है। मैंने तुम्हें इसलिए पाल-पोशकर बड़ा किया था ताकि तुम दुनिया जीत सको, तरक्की की ऊंचाइयों को छू सको। एक बूढ़े की लाश के लिए तुम अपना लाखों का नुकसान मत करना।

इसीलिए मैंने अपनी मृत्यु की व्यवस्था पहले ही कर दी है। एजेंसी को पैसे दे दिए हैं, वे सब संभाल लेंगे। तुम आ सको तो बहुत अच्छा है, और अगर काम के सिलसिले में न आ सको, तो भी मुझे अपने बेटे से कोई शिकायत नहीं है।

बस एक आखिरी विनती है— जब तुम छोटे थे और मैं तुम्हें स्कूल छोड़ने जाता था, तो भीड़ में तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ता था। आज जब तुम मुझे मुखाग्नि दो, तो तुम्हारा हाथ काँपना नहीं चाहिए। जल्दी वापस चले जाना, तुम्हारी पत्नी वहाँ इंतज़ार कर रही होगी।
तुम्हारा,
पापा।”

सफलता का भ्रम टूटा: ‘करोड़पति भिखारी’:-

चिट्ठी का एक-एक शब्द कमल के कलेजे को चीरता चला गया। अचानक श्मशान के कीचड़ और राख के बीच उसके हाथ से वह महंगी चेकबुक छूटकर गिर गई।

जिस श्मशान में लकड़ियों के चटकने की आवाज़ आ रही थी, वहाँ अब कमल के अहंकार, उसके वाइस प्रेसिडेंट के पद और उसके करियर का घमंड जलकर राख हो चुका था। वह घुटनों के बल बैठ गया और फूट-फूटकर रोने लगा।

वह चिल्लाया— “पापा…!! मुझे माफ कर दीजिए!”

उसने कमलेश के पैर पकड़ लिए और रोते हुए कहा, “कमलेश, मुझे अमेरिका नहीं जाना। मुझे अपनी फ्लाइट नहीं पकड़नी। मुझे अपने पापा के साथ रहना है! मैंने विदेशों में रहकर करोड़ों रुपये कमाए, लेकिन आज समझ आया कि मैं तो दुनिया का सबसे बड़ा भिखारी हूँ! मेरे पापा मरते समय भी मेरी मीटिंग की चिंता कर रहे थे, और मैं यहाँ उनके अंतिम दर्शन का भी मिनटों में हिसाब लगा रहा था?”

उस दिन कमल अपनी 6 बजे की फ्लाइट नहीं पकड़ सका। वह अपनी कॉर्पोरेट दुनिया को भूलकर, जलती हुई चिता के सामने रात भर सिर झुकाकर बैठा रहा। क्योंकि उस रात उसे समझ आ गया था कि जिंदगी की असली कमाई क्या होती है।

इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है? (Life Lessons from the Story):-

यह कहानी हमारे आधुनिक समाज की तीन सबसे बड़ी कमियों पर प्रहार करती है:

1. प्रीपेड सिर्फ सिम कार्ड होता है, पिता का प्रेम नहीं:-

आज हम हर चीज़ को आउटसोर्स करने के आदी हो चुके हैं। कपड़े धोने से लेकर खाना पकाने तक, सब कुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है। लेकिन ‘रिश्ते’ और ‘भावनाएँ’ कभी प्रीपेड नहीं हो सकतीं। माता-पिता का प्यार ‘अनलिमिटेड’ होता है, और उसकी कीमत दुनिया की कोई भी करेंसी या डॉलर नहीं चुका सकती।

2. व्यवस्थाएं खरीदी जा सकती हैं, आँसू नहीं:-

“एजेंसी अंतिम संस्कार की बेहतरीन व्यवस्था तो कर सकती है, लेकिन उसकी आँखों में आपके माता-पिता के लिए आँसू नहीं हो सकते। वे आँसू सिर्फ खून के रिश्तों के ही होते हैं।”

आजकल महानगरों में अंतिम संस्कार कराने वाली कई कंपनियाँ आ गई हैं। वे आपकी सहूलियत के लिए सब कुछ कर देंगी, लेकिन जो सम्मान, जो स्पर्श और जो भावनात्मक विदाई एक संतान अपने माता-पिता को दे सकती है, वह कोई तीसरी पार्टी कभी नहीं दे सकती।

3. सफलता की अंधी दौड़ बनाम पारिवारिक मूल्य:-

हम किसके लिए कमा रहे हैं? दिन-रात की यह भागदौड़ किसके लिए है? अगर हमारे पास उस माँ-बाप के लिए समय नहीं है जिन्होंने हमें इस काबिल बनाया, तो हमारी सफलता शून्य है। करियर ज़रूरी है, लेकिन अपनों की कीमत पर नहीं।

एक कड़वा विश्लेषण: क्या हम भी ‘कमल’ बन रहे हैं?

आज के युवा अक्सर यह तर्क देते हैं कि “प्रैक्टिकल होना ज़रूरी है” या “काम की प्रतिबद्धताओं (Work Commitments) को छोड़ा नहीं जा सकता।” लेकिन हमें यह समझना होगा कि कंपनियाँ हमारे रिप्लेसमेंट (विकल्प) को ढूंढने में 5 दिन भी नहीं लगाएंगी, लेकिन माता-पिता के चले जाने के बाद उस खालीपन को दुनिया की कोई ताकत नहीं भर सकती।

निष्कर्ष: ‘फादर्स डे’ या ‘मदर्स डे’ सिर्फ एक दिन का स्टेटस नहीं है

सोशल मीडिया पर साल में एक दिन “Father’s Day” या “Mother’s Day” का स्टेटस लगा देना या उन्हें महंगे तोहफे भेज देना काफी नहीं है। माता-पिता को आपके पैसों से ज्यादा आपके “समय” की भूख होती है।

अगर आज आपके माता-पिता आपके साथ हैं, तो उनसे बात कीजिए, उनके पास बैठिए। अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ पल निकालकर उनसे उनका हालचाल पूछिए। याद रखिए, जिन माता-पिता ने आपका बचपन सँवारा, उनके अंतिम सफर में और उनके बुढ़ापे में साथ देने से कभी पीछे मत हटिए। वरना एक दिन हमारे पास पैसा तो बहुत होगा, लेकिन उसे मनाने के लिए अपने नहीं होंगे।

आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या आपको भी लगता है कि आज का समाज इस दिशा में बढ़ रहा है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें और इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करें, ताकि कोई और ‘कमल’ बनने से बच सके।

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